
नई दिल्ली।नीम का पेड़ भारतीय जीवन और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रहा है। आयुर्वेद से लेकर गांवों की रोजमर्रा की जिंदगी तक, नीम को औषधीय गुणों और प्राकृतिक सुरक्षा कवच के रूप में जाना जाता है। लेकिन अब यही नीम के पेड़ खुद गंभीर संकट में फंसते नजर आ रहे हैं। खासतौर पर तेलंगाना में नीम के पेड़ों पर फैल रहा एक खतरनाक फंगल संक्रमण वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों के लिए चिंता का विषय बन गया है।
क्या है डाइबैक रोग और क्यों बन रहा है खतरा
नीम के पेड़ों को प्रभावित करने वाले इस रोग को ‘डाइबैक’ कहा जाता है। यह बीमारी पेड़ की ऊपरी शाखाओं से शुरू होती है और धीरे-धीरे नीचे की ओर बढ़ती चली जाती है। शुरुआत में पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं, फिर टहनियां सूखने लगती हैं और अंत में पूरा पेड़ कमजोर हो जाता है।
बारिश और नमी ने बढ़ाई समस्या
बीते कुछ सालों में मानसून का स्वरूप बदला है। लंबे समय तक लगातार बारिश और वातावरण में बनी अत्यधिक नमी ने इस फंगस के लिए अनुकूल परिस्थितियां तैयार कर दी हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि जून से अक्टूबर के बीच हुई असामान्य बारिश ने संक्रमण को और तेज कर दिया। यही वजह है कि शहरों के साथ-साथ ग्रामीण इलाकों में भी नीम के पेड़ तेजी से प्रभावित हो रहे हैं।
नया पौधों पर ज्यादा खतरा
इस फंगल संक्रमण का सबसे ज्यादा असर कम उम्र के नीम के पौधों पर देखा जा रहा है। एक से दो साल के पौधे इस रोग को झेल नहीं पा रहे हैं और कई मामलों में पूरी तरह सूख जा रहे हैं। हालांकि राहत की बात यह है कि बड़े और पुराने नीम के पेड़ अपेक्षाकृत मजबूत हैं और उनमें से कई समय के साथ खुद ही उबर जाते हैं। फिर भी, युवा पौधों का इस तरह खत्म होना भविष्य के लिए बड़ा खतरा माना जा रहा है।
इंसानों के लिए सुरक्षित है नीम
इस बीमारी को लेकर लोगों के मन में कई सवाल हैं, खासतौर पर नीम के पत्तों और उससे बने घरेलू या औषधीय उपयोग को लेकर। विशेषज्ञ साफ तौर पर कहते हैं कि यह फंगल संक्रमण केवल नीम के पेड़ों तक सीमित है और इससे इंसानों को कोई सीधा स्वास्थ्य खतरा नहीं है। नीम की पत्तियां, छाल और बीज पहले की तरह सुरक्षित माने जा रहे हैं।