लगाएं महुआ की बागवानी, लकड़ी फूल, फल और बीज की रहती है भारी डिमांड

    09-Jan-2026
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नई दिल्ली।महुआ के पेड़ को आज से पहले ग्रामिण अर्थव्यवस्था का रिढ़ माना जाता था। आज भी आदीवासी क्षेत्रों में महुका का जंगल है जिसे आदीवासी लोगों को बेहतर कमाई होती है। महुआ भारतीय वनों और ग्रामीण संस्कृति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और बहुपयोगी वृक्ष है। यह विशाल, सीधा, घनी शाखाओं वाला मानसूनी वृक्ष होता है। महुआ मुख्य रूप से दोमट एवं हल्की पथरीली मिट्टी में भी सहजता से उगने की क्षमता रखता है। भारत में यह उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में व्यापक रूप से पाया जाता है।

महुआ की पेड़ की विशेषताएं

महुआ का तना मजबूत और मध्यम मोटाई का होता है, जबकि इसकी शाखाएं अत्यंत घनी और छायादार होती हैं। फूलों के भीतर गाढ़ा, चिपचिपा और प्राकृतिक शर्करा से भरपूर रस होता है, जो मधुमक्खियों, पक्षियों, हिरण, भालू तथा अन्य वन्य जीवों को आकर्षित करता है। यही कारण है कि महुआ जैव विविधता के संरक्षण में भी अहम भूमिका निभाता है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महुआ की भूमिका

महुआ समुदायों के लिए केवल एक वृक्ष नहीं, बल्कि आजीविका का मजबूत आधार है। आज भी मध्य प्रदेश, छत्तिसगढ़ के आदीवासी इलाके में महुआ बेचकर लोग बेहतर लाभ कमाते है।इसके फूल ऊर्जा, कार्बोहाइड्रेट और खनिज तत्वों से भरपूर होते हैं। पशुओं के लिए इसकी पत्तियां उत्तम चारा हैं और पत्तों से पत्तल-दोने बनाकर स्थानीय रोजगार भी सृजित होता है।

महुआ की लकड़ी महंगी बिकती है

महुआ की लकड़ी महंगी बिकती है क्योंकि यह बेहद टिकाऊ होती है, इसमें दीमक और घुन नहीं लगते, और यह सड़ती नहीं, जिससे इसे घर बनाने और फर्नीचर के लिए बहुत पसंद किया जाता है, और इसकी कीमत ₹400 प्रति घन फुट तक हो सकती है, जो इसकी अच्छी गुणवत्ता और कम उपलब्धता के कारण है।