
Red Spider Mite : कद्दू वर्गीय सब्जियों और टमाटर की खेती करने वाले किसानों के लिए इन दिनों लाल मकड़ी बड़ा खतरा बनती जा रही है। यह सूक्ष्म लाल मकड़ी धीरे-धीरे फसलों को इस तरह नुकसान पहुंचाती है कि हरी-भरी फसल कुछ ही दिनों में सूखने लगती है। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि शुरुआती चरण में इसके लक्षण आसानी से नजर नहीं आते।
कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रमोद कुमार के अनुसार, यह कीट पौधों की पत्तियों से रस चूसकर उन्हें कमजोर कर देता है और उनकी प्राकृतिक विकास प्रक्रिया को पूरी तरह बाधित कर देता है। अगर समय पर पहचान और नियंत्रण न किया जाए, तो पूरी फसल बर्बाद होने की स्थिति बन सकती है।
लाल मकड़ी एक बेहद खतरनाक कीट है, जो मुख्य रूप से पत्तियों की निचली सतह पर जाला बनाकर रहता है। यह जाला देखने में ऐसा लगता है जैसे पत्तियों पर धूल की परत जम गई हो। यह कीट पत्तियों की कोशिकाओं से रस चूस लेता है, जिससे पत्तियों पर पीले और सफेद धब्बे बनने लगते हैं। धीरे-धीरे पत्तियां सूखकर गिरने लगती हैं और पौधा कमजोर हो जाता है। इसका सीधा असर फसल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों पर पड़ता है।
लाल मकड़ी का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि इसके द्वारा बनाए गए जाले पत्तियों की सतह को ढक लेते हैं। इससे पौधों में फोटोसिंथेसिस यानी प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया बाधित हो जाती है। जब पौधे पर्याप्त भोजन नहीं बना पाते, तो उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी कमजोर हो जाती है। ऐसे में थोड़े समय में ही पूरी फसल पीली पड़कर सूखने लगती है। यह स्थिति किसानों के लिए आर्थिक रूप से बेहद नुकसानदायक साबित होती है।
लाल मकड़ी के संक्रमण को समय रहते पहचानना बहुत जरूरी है। इसके प्रमुख लक्षण हैं:
* पत्तियों की निचली सतह पर बारीक जाले दिखाई देना
* पत्तियों पर धूल जैसी परत जम जाना
* पीले और सफेद धब्बों का बनना
* पत्तियों का धीरे-धीरे सूखना
* पौधों की वृद्धि रुक जाना
अगर ये लक्षण दिखें तो तुरंत नियंत्रण उपाय अपनाना जरूरी है।
कीटनाशक का सही उपयोग ही बचाव का उपायलाल मकड़ी पर नियंत्रण के लिए सही दवा और सही समय पर छिड़काव बेहद जरूरी है। विशेषज्ञों के अनुसार 2 ml ओमाइट को 1 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें या 2 ग्राम घुलनशील गंधक प्रति लीटर पानी में उपयोग करें। छिड़काव हमेशा शाम के समय करना चाहिए, ताकि दवा का असर लंबे समय तक बना रहे और कीट प्रभावी रूप से खत्म हो सके।
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि समय रहते नियंत्रण करने से फसल सुरक्षित रहती है, उत्पादन बेहतर होता है और किसानों को बाजार में अच्छे दाम मिल सकते हैं।