Mango farmers MSP Demand : आम की खेती छोड़ने को मजबूर हो सकते हैं किसान! वजह जानकर चौंक जाएंगे

    14-May-2026
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Mango farmers MSP Demand :
तमिलनाडु के मदुरै जिले में आम की कटाई तेजी जोरों पर है, लेकिन किसानों की चिंता कम होने का नाम नहीं ले रही है। खासकर किलोमुक्कू या तोतापुरी आम उगाने वाले किसान को बाजार में बेहद कम दाम मिल रहे हैं। किसानों का कहना है कि उन्हें अपनी लागत तक निकालना मुश्किल हो रहा है, इसलिए अब उन्होंने सरकार से न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP तय करने की मांग की है।

जानकारी के अनुसार, मदुरै जिले में करीब 5000 हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र में आम की खेती होती है। यहां बंगनपल्ली, कल्लामई, हिमाम पसंद और कई दूसरी किस्मों के आम उगाए जाते हैं। आम की खेती इस इलाके के सैकड़ों किसानों की मुख्य आय का स्रोत मानी जाती है। हर साल गर्मियों के मौसम में यहां बड़े पैमाने पर आम की बिक्री होती है, लेकिन इस बार कल्लामई किस्म के आम की कीमतों में भारी गिरावट देखी जा रही है।

मदुरै सेंट्रल मार्केट ट्रेडर्स एसोसिएशन के अनुसार इस समय बाजार में कल्लामई आम 15 से 20 रुपये प्रति किलो के बीच बिक रहा है। वहीं दूसरी तरफ बंगनपल्ली और दूसरी लोकप्रिय किस्मों के आम 50 से 200 रुपये प्रति किलो तक बिक रहे हैं। किसानों का आरोप है कि बाजार में ऊंचे दाम पर बिकने के बावजूद उन्हें खेत स्तर पर बहुत कम कीमत मिल रही है। कई किसानों को केवल 5 से 8 रुपये प्रति किलो तक का दाम मिल पा रहा है।

कल्लामई आम की खेती करने वाले किसान और तमिलर मक्कल इयक्कम संगठन से जुड़े किसान नेता सी जीवा ने कहा कि किसानों की स्थिति लगातार खराब होती जा रही है। उन्होंने बताया कि किसान सालभर मेहनत करते हैं, लेकिन खरीद के समय सही दाम नहीं मिलता। उन्होंने तमिलनाडु सरकार से मांग की कि कल्लामई आम के लिए कम से कम 20 रुपये प्रति किलो MSP तय किया जाए, ताकि किसानों को नुकसान से बचाया जा सके।

कई किसानों ने आरोप लगाया कि असली फायदा बिचौलियों और व्यापारियों को हो रहा है। किसान कम कीमत पर आम बेचने को मजबूर हैं, जबकि बाजार में वही आम कई गुना ज्यादा कीमत पर बिकता है।

आज आम किसान सबसे बड़ी समस्या बाजार की अनिश्चित कीमतों को मान रहे हैं। मौसम की मार, बढ़ती खेती लागत और कम बाजार भाव ने उनकी मुश्किलें बढ़ा दी हैं। किसानों का कहना है कि अगर सरकार समय रहते दखल नहीं देती, तो आने वाले वर्षों में कई किसान आम की खेती छोड़ने को मजबूर हो सकते हैं।