
Heat Stress In Plants : तेजी से बढ़ती गर्मी अब सिर्फ मौसम की स्थिति नहीं रह गई है, बल्कि सीधे खेतों के नुकसान का कारण बनती जा रही है। 35 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंचते ही कई क्षेत्रों में सब्जियों और अन्य फसलों पर इसका असर दिखने लगा है। पौधों की पत्तियां मुरझा रही हैं, उनकी बढ़वार रुक गई है और उत्पादन पर सीधा असर दिख रहा है। इस बढ़ते खतरे को ही हीट स्ट्रेस कहा जाता है।
हीट-स्ट्रीस तब होता है जब तापमान पौधों की सहनशीलता से ज़्यादा हो जाता है। सामान्यतः 35 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान फसलों के लिए नुकसानदायक माना जाता है। इस स्थिति में पौधों में पानी की कमी, पोषक तत्वों का असंतुलन और फोटोसिंथेसिस की प्रक्रिया धीमी हो जाती है।
लगातार बढ़ता तापमान और तेज गर्म हवाएं, मिट्टी में नमी की कमी, असंतुलित पोषण और कम सिंचाई, तेज धूप के लंबे समय तक संपर्क में रहना, बदलता जलवायु पैटर्न आदि बहुत से कारण हैं जिनसे पौधों पर तनाव बढ़ जाता है और उनकी वृद्धि रुक जाती है।
हीट स्ट्रेस का असर कई फसलों पर साफ देखा जा सकता है, खासकर टमाटर, मिर्च, बैंगन, खीरा, करेला और अन्य सब्जी वाली फसलों पर. तेज गर्मी के कारण इन पौधों की पत्तियां मुरझाने लगती हैं, पौधों की बढ़वार रुक जाती है और फलों का आकार छोटा रह जाता है। साथ ही, फलों की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है, जिससे उत्पादन और बाजार मूल्य दोनों में कमी आ सकती है।
किसानों को इन लक्षणों पर खास ध्यान देना चाहिए, पत्तियों का पीला पड़ना या मुरझाना, पौधों की बढ़वार का रुक जाना, मिट्टी में नमी की कमी, फूल और फलों का गिरना तथा पौधों में स्पष्ट रूप से कमजोरी दिखाई देना। ये सभी संकेत हीट स्ट्रेस की ओर इशारा करते हैं और समय रहते पहचान जरूरी है ताकि फसल को नुकसान से बचाया जा सके।
फसलों को बचाने के लिए कुछ जरूरी कदम
* समय पर पानी दें और मिट्टी को सूखने न दें
* खेत में सूखी घास या पुआल बिछा दें ताकि नमी बनी रहे
* तेज धूप से बचाने के लिए पौधों को हल्की छाया में रखें या शेड नेट लगाएं
* गोबर की खाद या जैविक खाद का इस्तेमाल करें
* पत्तों पर पोटाशियम और अमीनो एसिड का हल्का छिड़काव करें
* पानी सुबह या शाम के समय दें ताकि पानी जल्दी सूखे नहीं
हीट-स्ट्रीस एक गंभीर कृषि समस्या बनती जा रही है, खासकर बदलते मौसम के कारण। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर किसान समय रहते सही प्रबंधन अपनाएं, तो हीट स्ट्रेस से होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है और उत्पादन को सुरक्षित रखा जा सकता है।