El-Nino Impact : अल नीनो ने बढ़ाई किसानों की टेंशन! मानसून कमजोर पड़ा तो घट सकती है फसलों की पैदावार

    18-May-2026
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El-Nino Impact :
देश में इस साल मानसून को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है। मौसम वैज्ञानिकों और कृषि विशेषज्ञों की नजर अब अल नीनो की स्थिति पर टिकी हुई है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अल नीनो का असर बढ़ा तो इसका सीधा प्रभाव मानसून और खेती पर पड़ सकता है। इसी बीच कृषि वैज्ञानिकों के एक अध्ययन ने किसानों और सरकार दोनों की चिंता बढ़ा दी है।

ख़बरों के अनुसार, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद से जुड़े वैज्ञानिकों की एक टीम ने अपनी रिसर्च में पाया है कि जिन वर्षों में अल नीनो सक्रिय रहा, उन वर्षों में देश के कई राज्यों में खरीफ फसलों का उत्पादन 10 प्रतिशत से ज्यादा तक घट गया था। सबसे ज्यादा असर धान और मक्का जैसी प्रमुख फसलों पर देखा गया। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय रहते तैयारी नहीं की गई तो इस साल भी कई जिलों में किसानों को नुकसान उठाना पड़ सकता है।

क्या होता है अल नीनो
अल नीनो समुद्र की सतह के तापमान से जुड़ी एक जलवायु स्थिति है। इसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है। इसका असर दुनिया के कई देशों के मौसम पर पड़ता है।

भारत में अल नीनो को कमजोर मानसून से जोड़कर देखा जाता है। जब मानसून कमजोर होता है तो बारिश कम होती है और इसका सीधा असर खेती पर पड़ता है. खासकर खरीफ सीजन की फसलें बारिश पर ज्यादा निर्भर रहती हैं, इसलिए किसानों की चिंता बढ़ जाती है।

धान और मक्का पर सबसे ज्यादा असर
कृषि वैज्ञानिकों के अध्ययन के अनुसार अल नीनो वाले वर्षों में देश के कई जिलों में धान और मक्का की पैदावार में भारी गिरावट देखी गई। रिसर्च में बताया गया कि धान उत्पादन 77 जिलों में 10 प्रतिशत से ज्यादा घट गया था। वहीं मक्का की पैदावार 65 जिलों में प्रभावित हुई। इसके अलावा ज्वार और बाजरा जैसी फसलों के उत्पादन में भी गिरावट दर्ज की गई। करीब 36 जिलों में इन फसलों की पैदावार 10 प्रतिशत से ज्यादा कम हुई थी।

इन राज्यों में सबसे ज्यादा खतरा
रिपोर्ट के अनुसार आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, झारखंड और ओडिशा जैसे राज्यों में धान उत्पादन पर सबसे ज्यादा असर देखा गया. इन राज्यों में लाखों किसान खरीफ फसलों पर निर्भर रहते हैं। बारिश कम होने से खेतों में पानी की कमी हो जाती है, जिससे फसल की वृद्धि प्रभावित होती है और उत्पादन घट जाता है।

पुराने आंकड़ों से निकला निष्कर्ष
वैज्ञानिकों ने 2002, 2004 और 2009 जैसे अल नीनो वर्षों का अध्ययन किया। इसमें अलग-अलग जिलों के वर्षा और फसल उत्पादन के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। वैज्ञानिकों ने अलग-अलग जिलों के वर्षा आंकड़ों और फसल उत्पादन के आंकड़ों का अध्ययन कर यह निष्कर्ष निकाला कि अल नीनो के दौरान मानसून में भारी बदलाव देखने को मिला था। कम बारिश और मौसम में बदलाव के कारण कई जिलों में फसल उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हुआ था।

किसानों के लिए बढ़ सकती है मुश्किल
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर इस साल भी अल नीनो का असर बना रहा तो किसानों को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। कम बारिश होने पर सिंचाई का खर्च बढ़ जाएगा. जिन इलाकों में सिंचाई की अच्छी व्यवस्था नहीं है, वहां फसलों को सबसे ज्यादा नुकसान हो सकता है। इसके अलावा पशुओं के चारे और जल संकट जैसी समस्याएं भी बढ़ सकती हैं। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ने की आशंका है।

वैज्ञानिकों ने दिए सुझाव
कृषि वैज्ञानिकों ने सरकार सूखा सहन करने वाली फसल किस्मों को बढ़ावा देने की सलाह दी है। इसके साथ ही मौसम आधारित कृषि सलाह सेवाओं को मजबूत करने और पानी के बेहतर प्रबंधन पर जोर देने की जरूरत है।