Ridge Gourd/Tori Farming : सिर्फ 35 दिन में शुरू होगी कमाई, मचान विधि से करें तोरई की खेती

    25-May-2026
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Ridge Gourd/Tori Farming :
अगर किसान काम समय में अच्छा मुनाफा कामना चाहते हैं तो तोरई (तुरई) की खेती आपके लिए एक अच्छा ऑप्शन बन सकता है। आमतौर पर तोरई की फसल तैयार होने में 50 से 60 दिन का समय लगता है, लेकिन अगर आप इसे पारंपरिक तरीके के बजाए आधुनिक तरीके से करते हैं तो मात्र 30 से 35 दिनों में ही तोरई की पहली तुड़ाई शुरू की जा सकती है।

बाजार में तोरई की मांग हमेशा रहती है, ऐसे में आपको इसके दाम भी आसमान छूते हुए मिलेंगे। आइए जानते हैं कि कौन सी है वो आधुनिक तकनीक जिसे अपनाकर तोरई की खेती से आप बन सकते हैं लखपति। यह विधि और कोई नहीं बल्कि मचान विधि है।

क्या है मचान विधि?

मचान विधि जिसे पंडाल विधि भी कहा जाता है, इस विधि में खेत में बांस, लकड़ी या लोहे के पाइप की सहायता से ऊपर जालीनुमा ढांचा तैयार किया जाता है। तोरई की बेलों को इस मचान पर चढ़ाया जाता है। इससे बेल जमीन से ऊपर रहती है और फलों का विकास बेहतर तरीके से हो पाता है। साथ ही फसल में सड़न और कीटों का खतरा भी कम हो जाता है।

सामान्य खेती की तुलना में मचान विधि से करीब 25 से 40 प्रतिशत तक अधिक पैदावार होती है। इसके साथ ही इस विधि को अपनाने से बेलों को पर्याप्त धूप और हवा मिलती है जिससे फल लंबे, हरे और आकर्षक होते हैं, इससे बाजार में अच्छे दाम मिलते हैं। तोरई की बेल जमीन पर फैलने से अक्सर फलों में सड़न और कीट लगने की समस्या बढ़ जाती है, लेकिन मचान विधि में फल हवा में लटकते रहते हैं, जिससे नमी कम रहती है और रोगों का असर भी घट जाता है। इससे दवाओं पर खर्च कम होता है और फसल अधिक सुरक्षित रहती है।

खेत की तैयारी और बुवाई का समय
तापमान और मिट्टी- इसकी अच्छी फसल के लिए 25 डिग्री सेल्सियस से 37 डिग्री सेल्सियस तापमान और 6.5 से 7.5 पीएच वाली मिट्टी सबसे उत्तम मानी जाती है।

बुवाई का समय- गर्मियों की फसल के लिए फरवरी-मार्च का समय सबसे अच्छा होता है। बीज को लगभग 2.5 x 2 मीटर की दूरी पर 30 सेंटीमीटर के गड्ढों में बोया जाता है।

खाद और सिंचाई प्रबंधन
बेलों की अच्छी ग्रोथ के लिए समय-समय पर जैविक खाद (गोबर की खाद) या यूरिया का इस्तेमाल करें। पौधों के आसपास नमी बनाए रखें,लेकिन खेत में जलभराव न होने दें।

तुड़ाई और पैदावार
बुवाई के 30 से 35 दिन बाद फूल आने लगते हैं और पहली तुड़ाई शुरू हो जाती है.फलों को कच्चा और हरा होने पर ही तोड़ लें, ज्यादा पकने पर कीमत कम मिलती है। प्रति एकड़ लगभग 80 से 120 क्विंटल तक तक पैदावार होती है।