
CSIR Floriculture Mission : भारत के करीब 85 फीसदी किसानों के पास छोटी जोत की ज़मीन हैं, जहाँ गेहूं-धान जैसी पारम्परिक फसलों में लागत निकालना भी मुश्किल हो जाता है। ऐसे में अब छोटे किसान फूलों की खेती से कम जमीन में बेहतर मुनाफा कमा सकते हैं।
वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद यानी सीएसआईआर ने किसानों की आय बढ़ाने के लिए फ्लोरीकल्चर मिशन शुरू किया है, जो न सिर्फ किसानों को नई फसलों से जोड़ रहा है, बल्कि उन्हें ट्रेनिंग, तकनीक और बाजार तक पहुंच भी दे रहा है। पहाड़ी इलाकों में ट्यूलिप और पियोनी जैसे फूलों की खेती फायदेमंद हो सकती है। वहीं, मैदानी क्षेत्रों में गुलाब और गेंदे की व्यावसायिक खेती पहले से ही फायदेमंद साबित हो रही है।
जलवायु के मुताबिक, फूलों की किस्में विकसित की जा रही हैं। ट्यूलिप, ग्लैडियोलस, लिली और पियोनी जैसे महंगे फूलों की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। निर्यात के लिए गुणवत्ता वाले फूल उगाने की ट्रेनिंग दी जा रही है।
ग्रीनहाउस और आधुनिक खेती तकनीकों की मदद से कम जमीन में ज्यादा उत्पादन लेना संभव हो रहा है। किसानों को ड्रिप सिंचाई, हाई-डेंसिटी प्लांटेशन और आधुनिक फ्लोरीकल्चर तकनीकों की जानकारी दी जा रही है, जिससे उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में सुधार हो सके।
किसानों को मिलेंगे ये पांच बड़े फायदे * फूलों की खेती पारंपरिक फसलों से ज्यादा मुनाफा देती है। ट्यूलिप व गुलाब जैसे फूलों की घरेलू और विदेशी बाजारों में अच्छी मांग है।
* ग्रीनहाउस और उच्च घनत्व खेती की तकनीक किसान छोटे खेत में भी बड़ा उत्पादन ले सकते हैं।
* विभिन्न किस्म के फूल अलग-अलग मौसम में खिलते हैं, इसलिए एक बार शुरू करने के बाद पूरे साल कमाई का जरिया बना रहता है।
* भारत से फूलों का निर्यात लगातार बढ़ रहा है। मिशन के तहत किसानों को एक्सपोर्ट क्वालिटी के फूल उगाने की ट्रेनिंग मिलती है।
* पैकेजिंग, प्रोसेसिंग व मार्केटिंग में युवाओं एवं महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर खुल रहे हैं।
अब भारत में हो सकती है पियोनी की खेती पियोनी फूल अब तक मुख्य रूप से नीदरलैंड से आयात किया जाता था। बाजार में इसकी कीमत 500 रुपये प्रति डंठल से भी ज्यादा होती है। पालमपुर स्थित सीएसआईआर-हिमालय जैवसंपदा प्रौद्योगिकी संस्थान (सीएसआईआर-आईएचबीटी) के वैज्ञानिकों ने दिखाया है कि हिमालयी इलाकों में इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है। पियोनी न सिर्फ सजावटी फूल के रूप में, बल्कि औषधीय गुणों के लिए भी जाना जाता है। इसकी जड़ों का इस्तेमाल पारंपरिक चीनी चिकित्सा में दर्द, सूजन और महिला रोगों के इलाज में होता है।
हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर के किसानों के लिए तो इस फूल की खेती किसी बड़े अवसर से कम नहीं है। सीएसआईआर-आईएचबीटी ने इसके लिए संपूर्ण एग्रो-टेक्नोलॉजी पैकेज तैयार किया है, जिसमें बताया गया है कि कौन-सी किस्म लगाएं, कब लगाएं, मिट्टी कैसे तैयार करें, सिंचाई कैसे करें, रोग से कैसे बचाएं और कटाई के बाद फूल को कैसे संभालें।
सीएसआईआर-आईएचबीटी, पालमपुर हिमालयी क्षेत्र के किसानों के लिए नई किस्में विकसित कर रहा है। आईसीएआर के संस्थान फूलों की रोग-प्रतिरोधक किस्मों और उत्पादन तकनीकों पर काम कर रहे हैं। देश भर के कृषि विश्वविद्यालय स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से खेती के मॉडल तैयार कर किसानों को ट्रेनिंग दे रहे हैं।
किसान ऐसे करें शुरुआत
* सीएसआईआर-आईएचबीटी और कृषि विश्वविद्यालय समय-समय पर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करते हैं। इनसे जुड़कर प्रशिक्षण लें।
* अपने क्षेत्र के मुताबिक फसल चुनें। पहाड़ी क्षेत्रों के लिए ट्यूलिप और पियोनी, मैदानी इलाकों के लिए गुलाब और गेंदा बेहतर विकल्प हैं।
* सरकारी योजनाओं का फायदा उठाएं। सब्सिडी, किसान ऋण और फसल बीमा जैसी योजनाओं से शुरुआती लागत बहुत कम हो जाती है।
* ग्रीनहाउस, ड्रिप सिंचाई और कोल्ड स्टोरेज जैसी आधुनिक तकनीक अपनाएं।
* सीधे बाजार से जुड़ें। मंडी के अलावा ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, फ्लावर एक्सपोर्ट कंपनियों और इवेंट मैनेजमेंट कंपनियों से सीधा संपर्क करें।