Technology In Farming : अब AI बताएगा कितनी होगी बासमती की पैदावार! सरकार का बड़ा सर्वे प्लान शुरू

    07-May-2026
Total Views |

Technology In Farming :
भारत के बासमती चावल उद्योग में अब आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस यानि AI की एंट्री होने जा रही है। केंद्र सरकार पहली बार बड़े स्तर पर AI की मदद से बासमती धान का सर्वे कराने की तैयारी में है। इसे बासमती उत्पादन, खेती और निर्यात से जुड़ी सटीक जानकारी जुटाने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।

केंद्र सरकार की एजेंसी Agricultural and Processed Food Products Export Development Authority (APEDA ) अब 2026 से 2028 के बीच लगभग 40 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में AI आधारित बासमती सर्वे कराएगी। इस योजना की घोषणा केंद्रीय वाणिज्य राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने की।

सरकार के अनुसार यह भारत का पहला AI आधारित बासमती धान सर्वे होगा। इसका उद्देश्य बासमती उत्पादन का सटीक आंकड़ा जुटाना, अलग-अलग किस्मों की पहचान करना और किसानों को वैज्ञानिक सलाह देना है। इसके जरिए निर्यात की बेहतर योजना बनाने में भी मदद मिलेगी।

सरकारी जानकारी के मुताबिक इस सर्वे में लगभग 40 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर किया जायेगा। इसके तहत 1.5 लाख से ज्यादा ग्राउंड ट्रुथ पॉइंट्स से डेटा जुटाया जाएगा और 5 लाख से ज्यादा किसानों को इस पूरी प्रक्रिया में शामिल किया जाएगा।

इस योजना को लेकर उद्योग जगत में चर्चा और सवाल दोनों शुरू हो गए हैं। दरअसल APEDA की 2023 की रिपोर्ट में बासमती खेती का कुल क्षेत्रफल केवल 21.4 लाख हेक्टेयर बताया गया था लेकिन अब नया सर्वे लगभग 40 लाख हेक्टेयर में कराया जा रहा है, जो पहले के आंकड़ों से लगभग दोगुना है।

नई योजना के बाद बासमती GI यानी भौगोलिक संकेतक क्षेत्र को बढ़ाने की चर्चाएं भी तेज हो गई हैं। फिलहाल पारंपरिक बासमती क्षेत्र कुछ चुनिंदा राज्यों तक सीमित माना जाता है लेकिन अब ऐसा माना जा रहा है कि सरकार सुगंधित धान उत्पादन वाले दूसरे इलाकों की भी मैपिंग करना चाहती है।

इस परियोजना को बासमती एक्सपोर्ट डेवलपमेंट फाउंडेशन (BEDF) के फंड से चलाया जाएगा। इसके लिए APEDA निर्यातकों से हर टन पर 70 रुपये का शुल्क लेती है। यह शुल्क कॉन्ट्रैक्ट रजिस्ट्रेशन के दौरान अनिवार्य रूप से लिया जाता है।

उद्योग संगठन पर भी उठे सवाल
इस परियोजना में एक खास उद्योग संगठन के सहयोग को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। कुछ उद्योग सूत्रों का कहना है कि उस संगठन का एक प्रतिनिधि BEDF बोर्ड का सदस्य भी है। इसी वजह से पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर चर्चा शुरू हो गई है।

2024 में बंद हो गया था सर्वे
उद्योग से जुड़े लोगों के अनुसार APEDA हर साल बासमती सर्वे कराती थी। हालांकि कोरोना महामारी के दौरान यह प्रक्रिया प्रभावित हुई थी। इसके बाद 2024 में कुछ निर्यातकों के दबाव के चलते सर्वे बंद कर दिया गया था।
गैर-GI क्षेत्रों को शामिल करने पर विवाद
सूत्रों के मुताबिक सर्वे करने वाली एजेंसी से गैर-GI क्षेत्रों को भी शामिल करने के लिए कहा गया था लेकिन एजेंसी ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। उसका कहना था कि कानूनी तौर पर गैर-GI क्षेत्र की फसल को बासमती नहीं कहा जा सकता।

किसानों को क्या होगा फायदा?
अगर यह सर्वे सही तरीके से लागू हुआ, तो किसानों को बड़ा फायदा मिल सकता है। इससे उन्हें फसल की सही जानकारी, बेहतर सलाह और निर्यात बाजार की मांग के हिसाब से खेती करने में मदद मिलेगी। इसके अलावा उत्पादन और गुणवत्ता बढ़ाने में भी सहायता मिल सकती है।

भारत दुनिया के सबसे बड़े बासमती निर्यातकों में शामिल है। ऐसे में सही उत्पादन डेटा और वैज्ञानिक सर्वे से निर्यात की बेहतर योजना बन सकेगी और अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय बासमती की स्थिति और मजबूत हो सकती है।