
Organic Farming Verification : देश भर में जैविक खेती करने वाले लाखों किसानों के लिए गुड न्यूज़ है। कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण ने जैविक किसानों के अनिवार्य भौतिक वेरिफिकेशन की अंतिम तारीख बढ़ाकर 3 जुलाई 2026 कर दी है, जिससे अब किसानों को अपने खेत और खेती से जुड़े दस्तावेजों के वेरिफिकेशन के लिए थोड़ा ज़्यादा समय मिल गया है।
सरकार के मुताबिक बहुत से किसानों को नेटवर्क समस्या,रिकॉर्ड अपडेट न होने और दूसरे राज्यों में काम पर जाने जैसी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था। इस वजह से जांच टीमों को उन्हें ढूंढने और वेरिफिकेशन करने में दिक्कत आ रही थी। इन समस्याओं को देखते हुए अब किसानों को अतिरिक्त समय दिया गया है।
क्यों जरूरी है यह वेरिफिकेशन?पिछले कुछ सालों में जैविक खेती का दायरा बढ़ा है। ऐसे में सरकार चाहती है कि बाजार में केवल वही उत्पाद जैविक कहलाएं जो वास्तव में बिना रासायनिक खाद और जहरीले कीटनाशकों के उगाए गए हों। इसी वजह से सरकार किसानों का भौतिक वेरिफिकेशन करवा रही है। इस प्रक्रिया में यह जांच की जाती है कि किसान वास्तव में जैविक तरीके से खेती कर रहे हैं या नहीं।
सरकार का मानना है कि इससे नकली जैविक उत्पादों पर रोक लगेगी और विदेशी बाजारों में भारतीय उत्पादों की विश्वसनीयता बढ़ेगी।
हालाँकि यह पहली बार नहीं है जब सरकार ने समय सीमा बढ़ाई हो। वेरिफिकेशन अभियान की शुरुआत 3 नवंबर 2025 से हुई थी और शुरुआत में इसे केवल तीन महीने में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था लेकिन यह काम उतनी तेजी से नहीं हो पाया जितनी उम्मीद थी। कई राज्यों और किसान समूहों ने सरकार से समय बढ़ाने की मांग की। इसके बाद पहले भी समय सीमा बढ़ाई गई थी और अब दूसरी बार इसे आगे बढ़ाया गया है।
प्राधिकरण के अध्यक्ष अभिषेक देव के अनुसार अब तक करीब 52 प्रतिशत किसानों का वेरिफिकेशन हो पाया है। यानी अभी भी बड़ी संख्या में किसान प्रक्रिया से बाहर हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में लाखों किसान जैविक खेती से जुड़े हुए हैं। लोकसभा में दी गई जानकारी के अनुसार राष्ट्रीय जैविक उत्पादन कार्यक्रम के तहत करीब 19 लाख 29 हजार से ज्यादा किसान प्रमाणित हैं। ये किसान देशभर के 4,712 जैविक किसान समूहों का हिस्सा हैं।
अगर वेरिफिकेशन नहीं कराया तो?सरकार के मुताबिक 3 जुलाई के बाद बिना वेरिफिकेशन वाले किसानों के लिए कई सेवाएं बंद हो सकती हैं। ट्रेसनेट प्रणाली ऐसे किसानों के रिकॉर्ड अपडेट नहीं करेगी। किसान अपनी उपज का विवरण दर्ज नहीं कर पाएंगे और उनकी फसल की खरीद-बिक्री से जुड़ी प्रक्रियाएं भी प्रभावित हो सकती हैं। इसका सीधा असर उन किसानों पर पड़ सकता है जो जैविक उत्पाद बेचते हैं या निर्यात से जुड़े हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रक्रिया किसानों के लिए लंबे समय में फायदेमंद साबित हो सकती है। जब किसानों का रिकॉर्ड पूरी तरह पारदर्शी होगा, तो उनके उत्पादों पर खरीदारों का भरोसा बढ़ेगा। इससे किसानों को बेहतर कीमत मिलने की संभावना भी बढ़ जाएगी।