नई दिल्ली।आंवला को जिसे आयुर्वेद में अमृत कहा गया है। आज के बदलते समय में बागवान आंवले की बागवानी से बेहतर कमाई कर रहे है। आज बाजार में 150 रुपये प्रति किलों के हिसाब से बीक रहा है। विटामिन C से भरपूर आंवले की मांग दवा कंपनियों, जूस उद्योग और घरेलू उपयोग तीनों ही स्तर पर तेजी से बढ़ी है। यही वजह है कि कम खर्च और अपेक्षाकृत कम देखभाल वाली इस फल को बागवान बड़े पैमाने पर अपना रहे हैं।
झुलसा रोग से करें बचाव
आंवले की बागवानी करने वाले बागवानों को झुलसा रोग से बचाना चाहिए। क्योंकि आंवले के पेड़ में झुलसा रोग तेजी से फैलता है। इस रोग में पेड़ की टहनियां ऊपर से नीचे की ओर सूखने लगती हैं और धीरे-धीरे पूरा तना प्रभावित हो जाता है। साथ ही कार्बेन्डाजिम या मैन्कोजेब जैसे फफूंदनाशकों का सही मात्रा में छिड़काव करने से इस रोग खत्म किया जा सकता है।
धब्बा रोग से पत्तिया खराब
बरसात के दिनों में पत्तियों पर पानी जैसे छोटे-छोटे धब्बे दिखाई देना धब्बा रोग का संकेत होता है। समय के साथ ये धब्बे जलने जैसे नजर आने लगते हैं और पत्तियां कमजोर हो जाती हैं।
एन्थ्रेक्नोज से फल झड़ने की समस्या
एन्थ्रेक्नोज रोग आंवले के लिए बेहद नुकसानदायक होता है, क्योंकि इसमें पत्तियों, फूलों और फलों पर काले धब्बे बनते हैं। फल समय से पहले गिरने लगते हैं और जो फल बचते भी हैं, उनकी गुणवत्ता बाजार के लायक नहीं रहती।