El Nino 2026 Monsoon Effect : क्या इस बार सूखे की चपेट में आएगा भारत? जानिए क्यों हर बार खतरा नहीं बनता अल नीनो

    20-May-2026
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El Nino 2026 Monsoon Effect :
जब भी जून का महीना शुरू होता है देश में हर साल मौसम वैज्ञानिकों और सरकार की नजर मॉनसून पर टिक जाती है। देश की खेती, जल स्रोत और ग्रामीण अर्थव्यवस्था काफी हद तक बारिश पर निर्भर करती है। ऐसे में जब भी प्रशांत महासागर में अल नीनो बनने की खबर आती है, चिंता बढ़ना स्वाभाविक है।

इस बार भी वैज्ञानिकों ने सुपर अल नीनो बनने के संकेत दिए हैं, जिसके बाद से देशभर में मानसून को लेकर चर्चा तेज हो गई है। वैसे हर बार अल नीनो भारत के लिए सूखा लेकर नहीं आता, कई बार मजबूत अल नीनो भी भारत के मॉनसून को ज्यादा प्रभावित नहीं कर पाया है।

क्या होता है अल नीनो
अल नीनो एक प्राकृतिक मौसमीय प्रक्रिया है, जिसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। इससे दुनियाभर के मौसम पैटर्न प्रभावित होते हैं। भारत में इसका असर सबसे ज्यादा मॉनसून पर पड़ता है। आमतौर पर अल नीनो बनने पर मॉनसून की हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं और बारिश कम हो सकती है। यही वजह है कि भारत में अल नीनो को अक्सर सूखे और कमजोर बारिश से जोड़कर देखा जाता है।

भारत की लगभग 70 प्रतिशत सालाना बारिश जून से सितंबर के बीच होने वाले दक्षिण-पश्चिम मॉनसून से मिलती है। खेती, जलाशय, बिजली उत्पादन और पीने के पानी तक के लिए यह बारिश बेहद जरूरी होती है।

अगर इतिहास पर नजर डालें तो अल नीनो हमेशा भारत के लिए बुरा साबित नहीं हुआ। 1951 से 2022 के बीच करीब 60 प्रतिशत अल नीनो वर्षों में देश में सामान्य से कम बारिश हुई, लेकिन कई ऐसे साल भी रहे जब अल नीनो के बाद भी अच्छी बारिश दर्ज की गई।

सबसे बड़ा उदाहरण 1997-98 का माना जाता है। उस समय दुनिया के सबसे ताकतवर अल नीनो में से एक बना था। वैज्ञानिकों को डर था कि भारत में भीषण सूखा पड़ेगा, लेकिन हुआ इसका उल्टा। उस साल देश में सामान्य से ज्यादा बारिश हुई।

इसी तरह 1983 और 1994 में भी मजबूत अल नीनो के बावजूद सामान्य से 12 प्रतिशत तक ज्यादा बारिश दर्ज की गई। वहीं 2006 में कमजोर अल नीनो का मॉनसून पर ज्यादा असर नहीं पड़ा।

भारत को कैसे बचाता है इंडियन ओशन डाइपोल?
मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक अल नीनो का असर कई बार इंडियन ओशन डाइपोल यानी IOD कम कर देता है। IOD हिंद महासागर से जुड़ी एक मौसमीय स्थिति है। जब हिंद महासागर का पश्चिमी हिस्सा ज्यादा गर्म और पूर्वी हिस्सा ठंडा हो जाता है, तब पॉजिटिव IOD बनता है। इससे भारत की ओर आने वाली नमी वाली हवाएं मजबूत हो जाती हैं और मॉनसून को सहारा मिलता है। 1997 में यही हुआ था। उस समय मजबूत पॉजिटिव IOD ने अल नीनो के असर को काफी हद तक कमजोर कर दिया और भारत में अच्छी बारिश हुई।

सभी अल नीनो एक जैसे नहीं होते
IMD के अनुसार, हर अल नीनो का असर एक जैसा नहीं होता. यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि समुद्र में गर्म पानी किस हिस्से में ज्यादा है. अगर गर्मी प्रशांत महासागर के मध्य हिस्से में होती है, जिसे अल नीनो मोडोकी कहा जाता है, तो इसका असर भारत के मॉनसून पर ज्यादा गंभीर हो सकता है. वहीं अगर गर्म पानी पूर्वी हिस्से में ज्यादा हो, जैसा 1997 में हुआ था, तो भारत पर इसका असर अपेक्षाकृत कम रहता है.

जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई चुनौती
मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन ने मॉनसून की भविष्यवाणी को और मुश्किल बना दिया है। धरती का तापमान बढ़ने से समुद्र और जमीन के तापमान में अंतर बदल रहा है। इससे मॉनसून की हवाओं पर असर पड़ रहा है। कई बार यह बदलाव अल नीनो के असर को कमजोर कर देता है, तो कई बार हालात और खराब हो जाते हैं।

2002 और 2009 जैसे सालों ने बढ़ाई चिंता
विशेषज्ञ बताते हैं कि कई बार कमजोर अल नीनो भी भारी नुकसान पहुंचा सकता है। 2002 और 2009 में ऐसा ही देखने को मिला था। उन वर्षों में बारिश सामान्य का केवल 78 प्रतिशत ही रह गई थी और देश के कई हिस्सों में सूखे जैसे हालात बन गए थे।

मौसम विभाग कैसे लगाता है अनुमान?
पहले मौसम विभाग मुख्य रूप से अल नीनो के आधार पर मॉनसून का अनुमान लगाता था, लेकिन अब तकनीक काफी विकसित हो चुकी है।भारतीय मौसम विभाग (IMD) अब अल नीनो के साथ-साथ इंडियन ओशन डाइपोल, हिंद महासागर के तापमान, प्रशांत महासागर की स्थिति और ग्लोबल तापमान जैसे कई फैक्टर्स को ध्यान में रखकर पूर्वानुमान तैयार करता है।

इस साल क्या होगा?
फिलहाल सुपर अल नीनो बनने की आशंका को लेकर चिंता जरूर बढ़ी है, लेकिन विशेषज्ञ साफ कह रहे हैं कि इसे सूखे की गारंटी नहीं माना जा सकता।

वहीं देश के किसान और सरकार के लिए सबसे जरूरी है कि पानी बचाने, जल संरक्षण, बेहतर फसल योजना और मौसम के अनुसार खेती की तैयारी पहले से की जाए। क्योंकि मॉनसून की भविष्यवाणी आज भी पूरी तरह सटीक विज्ञान नहीं बन पाई है।